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स्मृतियाँ भी, श्रुतियाँ भी,
दादी नानी की कहानियां भी,
मनोरंजन का साधन थी,
सीख कुछ सिखाती थी।
पाठ्यक्रम का हिस्सा थी,
मैडम भी पढ़ाती थी।
बोल देवो की वाणी है,
सपनो में आती है।
पुरखों ने ढोही है,
लकीरें बनाती है।
शक्ति है, अदृश्य है,
न ये बातें बचकानी है।
भीतर भी, बाहर भी,
जो भी सब घटता है,
मानो ना मानो,
वही सारी कहानी है।

कहानी भी सत्य है,
सारे सच्चे है पात्र।
सियासी इस जंगल में,
दल दल के पास,
खड़ा शेर तेजस्वी,
मिचकती ये आँख।
आडम्बर खड़ा हो गया?
अब ले लो बैठ सांस।
नायक के भेस में शासक,
ये कैसा विरोधाभास?
माया तो बस,
मन का भ्रम है।
गीदड़ पर चढ़ा,
सोने का पानी है।
भीतर भी, बाहर भी,
जो भी सब घटता है,
मानो ना मानो,
वही सारी कहानी है।

शक्लें भी बदलती है,
आधुनिकता भी फलती है।
पर रोटी इस शासन की,
मेरे चुहलें पर ही पकती है।
उनके रेशम के कीड़े क्यों मुझ पर,
ये धोती तो सूती है?
महा यज्ञ ये सत्ता का,
इसमें मेरी ही आहुति है।
एकड़ों का बंजर,
आंकड़े बस बनकर,
आश्वासन ही ला पाए,
अभागे के घर पर।
रिंकी के पापा,
सोये तो बिस्तर पर,
पर अगले दिन पेड़ पर,
उनकी देह गरदन के बल लटकी है।
जिज्ञासु सब पूछे,
कौन जात के थे?
आंकड़े का अंक ही तो था,
फर्क पड़ना बेमानी है।
भीतर भी, बाहर भी,
जो भी सब घटता है,
मानो ना मानो,
वही सारी कहानी है।

शीर्षक क्या था?
किसकी थी लिखाई?
कौनसी थी लीपी?
संदर्भ तो बता दो भाई।
पटल पर लिखी थी,
किसी कुटिया में मिली थी,
हुई थी अकाशवानी,
और धरती पर गिरी थी।
हम सबने देखा,
तो लकीरें खिंची थी,
एक भले मानुष ने समझा,
और जीवन दर्शन भ्रान्ति कही थी।
है बंदा वह खुदा का,
सारी भीड़ ने ये माना,
कोई मिथक विद्या नहीं ये,
ये इतिहास सबने ना जाना।
एक बार की बात है,
मेरी दादी ने कही थी,
संदेह शुभ नहीं होता,
नानी ने भी हाँ भरी थी।
और यूँ ही चल आ रही पारी पाटी,
सहज ज्ञान की मनमानी है।
भीतर भी, बहार भी,
जो भी सब घटता है,
मानो ना मानो,
सारी ही कहानी है।

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