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आज फिर स्वर्णिम इतिहास से
युद्धो की जब याद हुई ,
पर मैदानो मे दव्दं तो
अब पुरानी बात हुई ।
अब तो भीतर का दव्दं ही ,
कोलाहल मचाता है ,
और वर्तमान अबकी बार
इतिहास को कठघरे मे बुलाना चाहता है ।

पूर्वजो की आदर्श मूरत को
हम सब ही मानते है ।
पर कहानी थी पूरी ,
क्या हम ये जानते है ?
जलते सूरज सा सत्य है ,
क्या आप मिट्टी सी शान को जरा पीछे छोड देंगे ।
और भयभीत न हो हम रोशनी से,
ऐसी आप क्या शिक्षा देंगे ?

कहता प्राकृतिक सिद्धांत,
जीता वही जिसमे बल है ।
और आज बलवान वही ,
जिसके पीछे अंधा दल है ।
लोकतंत्र है, सब समान है
फिर क्यो भीतर एक डर है ।
आम हूँ ,
हर मुद्दे पर बोलने से कतराता हूँ ।
था वह आँखो के सामने ही ,
पर मानने से मुकर जाता हूँ  ।
वह तो सब खरीद सकते है,
पर मै नही बिकना चाहता हूँ ।
अभिमान बचाए, कब तक
वह हमे सीधी उंगली से घी खाने देंगे ?
सही के साथ खडे रहे हम,
ऐसी आप क्या शिक्षा देंगे ?

आज प्रगति चलन मे है ,
हर रोज कुछ नया बनता है ।
पर सीखा है हम सभी ने ,
जल्दी करने से बनता काम बिगडता है ।
जल्दी से फूल उगाओ ,
ऐेसा पौधो पर दबाव नही ।
प्रातःकाल से पूर्व सूरज आया ,
यह किसी को याद नही ।
फिर क्यो सामाजिक दौड मे,
बचपन पिस जाता है ?
उसे औहदे का लोभ नही
वह तो पतंग उडाना चाहता है ।
पर निराशा मिटाने को हम,
आरक्षण को दोष देते है ।
र्वण-व्यवस्था भी राजनैतिक थी ,
यह हम क्यो भुला देते है ।
दिखा सपना आसमान का ,
आप स्वयं ही हमारे सामने जला देंगे ।
पर फिर भी जिदंगी का हाथ न छोडू मै ,
ऐसी आप क्या शिक्षा देंगे ?

भिन्न होकर भी एक है हर मनुष्य ,
फिर अनेक समुदाय किसकी रक्षा कर रहे है ।
“जो मुझसा नही दिखता वह हीन ही होगा “,
हम यह किस सोच से चल रहे है ।
उपनाम मेरी पहचान है ,
यह बात किसने समझाई ?
दाड़ी बडी या मूँछ
यह बात कहां से आई ?
इसी धर्म मे गौरव है,
मैने कब इसपर चिन्तन किया।
किस घर मे मै जन्म लूँ
इसका मैने कब चयन किया।
“ढुढूंगा पहचान मेरी ,
यह पहचान तो मुझ पर थोपी है ।”
पर यह विचार तुम्हे नही सताएगा ,
इसकी रक्षा की जिम्मेदारी तुम्हे जो सौपी है ।
रंग कृष्ण नही तो दाग ,
लिंग शिव नही तो पाप है ।
घुटता हूँ मै हर समय ,
पहचान मेरी अभिशाप है ।
किताबो मे तो कही लिखा नही ,
तो आप अनजान अनाथ को क्या नाम देंगे ?
पर यह भी अनदेखा कर मै वद्रोह न करुँ
ऐसी आप क्या शिक्षा देंगे ?

वर्तमान न तो पीडित है ,
न इतिहास कोई दोषी है ।
समय और समझ दोनो अलग है,
सिर्फ प्रयासो से समस्या हल होती है ।
सोच का न होता देश कोई ,
यह तो समाज का र्दपण है ।
न पूरा अधिकार है मेरा मुझपर ,
न जीवन का अर्थ सर्मपण है ।
मै जीवन चक्र मे हूँ या जीवन चक्र मेरे अन्दर ,
किसकी कल्पना आप बहतर कर लेंगे ?
हम अब राजा नही नायक बनने की सोचे,
आप ऐसी क्या शिक्षा देंगे ?

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