सच कितना ही छुपाना चाहो

तुम्हारी हर कोशिश बेकार है

कितना ही नकारना चाहो

अब वो साक्षात्कार है

खेल समझ गया वो भी

जो अभी तक निश्चिंत था

और जो गीत विजय के गा रहा है

अब डर उसे भी स्वीकार है।

और डर हो भी क्यों न

उसने देखा है क्या हो रहा है।

वो हर दिन किसी न किसी

अपने को खो रहा है।

वो ढूंढता अस्पताल है

पर उसे मिलती दुकाने,

उसके अपने ज़िंदा भी है या नही

ये भी नही आता कोई बताने,

वो लाचार है पर क्या करे?

दिखाना चाहता है आक्रोश, पर रो रहा है।

विश्व-गुरु का नागरिक फर्श पर मर गया

पर कैसे कह दे उसे “बेड” की दरकार है,

और जो गीत विजय के गा रहा था

अब डर उसे भी स्वीकार है।

जो ज़िंदा है उन्हें तो डरा सकते है

पर लाशें नही डरती।

कितने ही ऊँचे हो तुम्हारे महल

वो उनकी परवाह नही करती।

तुम उन्हें आकड़ो से बेदखल करो

वो धुंआ बन उठ हवा में फैल जाएंगी

तुम उनका अस्तित्व भुलाना चाहो

वो नदियों से किनारे पर लौट आएंगी।

वो तुम्हारी झूठी शान मिट्टी में मिला देंगी और कहेंगी के

“मिल जाता उन्हें अच्छा इलाज तो वो नही मरती।”

तुम इतिहास से भले ही मिटा दो पर वो लाशें

बन दस्तावेज करेंगी बयान के “कातिल ये सरकार है”

और जो गीत झूठी विजय के गा रहा था

अब उसे भी हार स्वीकार है।

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