World Beyond Illusion

Category: Poetry & Prose

मुख्यधारा तंत्र

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लगती है बड़ी भीड़, कुछ तो खास बेच रहे है,
चमकीले कागज़ में लिपटी बकवास बेच रहे है।
सफेद पुता हुआ झूठ बेच रहे है,
हमारी कम अक्ल का सबूत बेच रहे है।

पहले काली घाटी में आत्मा ढूंढा करते थे,
आज कल लोगो में काला दिल ढूंढ रहे है।
पहले झुग्गियों में सुविधाएं ढूंढा करते थे,
आज कल रहिसों की मुश्किल ढूंढ रहे है।

कही बिन मुर्गी का अंडा ढूंढ रहे है,
कहीं पहाड़ बनाने को राई ढूंढ रहे है।
कही मासूम के हाथ में डंडा ढूंढ रहे है,
और कही मासूम चेहरे वाला दंगाई ढूंढ रहे है।

नेताजी की दिनचर्या में बलिदान ढूंढ रहे है,
और मल उठाने वाले का आत्मसम्मान ढूंढ रहे है।
“तुम खतरे में हो” जैसी बात से भर रहे है सबके कान,
और हर खबर में दोष मढ़ने को मुसलमान ढूंढ रहे है।

सोचेंगे आप भी लोग खरीद क्यों रहे है?
जब ये बे सर पैर की बात बेच रहे है।
पर जब से जलते हुए घरो को, लोग शौक से देख रहे है
ये भी तभी से उनकी राख बेच रहे है।

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नकाब

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थामूंगा हाथ, मै करू ये वादा
बहुत हुआ, अब किया इरादा
खूब फरेबी इस जग में
मै तो तुझ सा हूँ
मेरा कोई नाम थोड़ी है!
झूठा प्यादा झूठा राजा
सब कुछ बासी, ना कुछ ताज़ा
चल तोड़ इमारत नेकी की
कानून का क्या है?
इसका कोई दाम थोड़ी है।
चुना गया मै तेरे हाथो
अब तुझे चुन दफनाऊंगा
कर भरोसा
जब मै कहूँ
अब तेरा कोई काम थोड़ी है।
पढ़ा-लिखा ना मै कुछ जानूं
तेरा इतिहास मै क्यूँ मानूं
जा खोल किताबें दिखा करीब से
अंधेरी रात हूँ
सिर्फ धुँधली शाम थोड़ी है।
भूख से, प्यास से
गरीबी से, बेरोजगारी से
बीमारी से, लाचारी से
किसी से तो मरेगा…
नहीं भी मरा तो क्या?
भीड़ हूँ मै
मेरा कोई नाम थोड़ी है।

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