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शव

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वो पूछना,

 भूले नही है।

 वो पूछ रहे है उनसे

 जो उठा रहे है आवाज़

 और उनसे

 जो मांग रहे है हिसाब।

 वो पूछना,

 भूले नही है।

 वो पूछ रहे है समुदाय विशेष से

 के तुमने क्या योगदान दिया

 और पूछ रहे है विपक्ष से

 के तुमने कितनी जानो को बचा लिया

 वो गढ़े मुर्दे इतिहास के

 अपने घरों के बाहर सजा रहे है

 और लाशो को नकार

 आकड़ो को बड़े गर्व से गिना रहे है

 वो पूछ रहे है उनसे

 जो समय से पहले चेता रहे थे

 और उनसे

 जो आईना दिखा रहे थे।

 वो देख बिलखते लोगो को

 कहते के ये अच्छा क्यों नही सोचते

 देते है सीख के उजड़ा घर तो क्या हुआ

 खंडर में सुकून क्यों नही खोजते

 वो दिखते मुस्कुराते हुए

 पर शव बन चुके है

 वो पूछ रहे है उनसे

 जो मर चुके है।

 वो बस पूछते नही है उससे

 अब वो पूछे भी तो किस मुँह से

 जब उसे खुद से ऊपर उठा दिया।

 चाहे प्रेम कहो या डर से

 उन्होंने उसे खुदा बना दिया।

 उसके लिए तो वह बस लड़ता है

 मारता है या फिर मरता है

 अब भला भगवान से कौन सवाल करता है

 हाँ वो पूछना

 भूले नही है

 पर वो भूल गए है

 सोचना,

 महसूस करना।

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नरंसहार

सच कितना ही छुपाना चाहो

तुम्हारी हर कोशिश बेकार है

कितना ही नकारना चाहो

अब वो साक्षात्कार है

खेल समझ गया वो भी

जो अभी तक निश्चिंत था

और जो गीत विजय के गा रहा है

अब डर उसे भी स्वीकार है।

और डर हो भी क्यों न

उसने देखा है क्या हो रहा है।

वो हर दिन किसी न किसी

अपने को खो रहा है।

वो ढूंढता अस्पताल है

पर उसे मिलती दुकाने,

उसके अपने ज़िंदा भी है या नही

ये भी नही आता कोई बताने,

वो लाचार है पर क्या करे?

दिखाना चाहता है आक्रोश, पर रो रहा है।

विश्व-गुरु का नागरिक फर्श पर मर गया

पर कैसे कह दे उसे “बेड” की दरकार है,

और जो गीत विजय के गा रहा था

अब डर उसे भी स्वीकार है।

जो ज़िंदा है उन्हें तो डरा सकते है

पर लाशें नही डरती।

कितने ही ऊँचे हो तुम्हारे महल

वो उनकी परवाह नही करती।

तुम उन्हें आकड़ो से बेदखल करो

वो धुंआ बन उठ हवा में फैल जाएंगी

तुम उनका अस्तित्व भुलाना चाहो

वो नदियों से किनारे पर लौट आएंगी।

वो तुम्हारी झूठी शान मिट्टी में मिला देंगी और कहेंगी के

“मिल जाता उन्हें अच्छा इलाज तो वो नही मरती।”

तुम इतिहास से भले ही मिटा दो पर वो लाशें

बन दस्तावेज करेंगी बयान के “कातिल ये सरकार है”

और जो गीत झूठी विजय के गा रहा था

अब उसे भी हार स्वीकार है।

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बदलाव व विडम्बना

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आज फिर स्वर्णिम इतिहास से
युद्धो की जब याद हुई ,
पर मैदानो मे दव्दं तो
अब पुरानी बात हुई ।
अब तो भीतर का दव्दं ही ,
कोलाहल मचाता है ,
और वर्तमान अबकी बार
इतिहास को कठघरे मे बुलाना चाहता है ।

पूर्वजो की आदर्श मूरत को
हम सब ही मानते है ।
पर कहानी थी पूरी ,
क्या हम ये जानते है ?
जलते सूरज सा सत्य है ,
क्या आप मिट्टी सी शान को जरा पीछे छोड देंगे ।
और भयभीत न हो हम रोशनी से,
ऐसी आप क्या शिक्षा देंगे ?

कहता प्राकृतिक सिद्धांत,
जीता वही जिसमे बल है ।
और आज बलवान वही ,
जिसके पीछे अंधा दल है ।
लोकतंत्र है, सब समान है
फिर क्यो भीतर एक डर है ।
आम हूँ ,
हर मुद्दे पर बोलने से कतराता हूँ ।
था वह आँखो के सामने ही ,
पर मानने से मुकर जाता हूँ  ।
वह तो सब खरीद सकते है,
पर मै नही बिकना चाहता हूँ ।
अभिमान बचाए, कब तक
वह हमे सीधी उंगली से घी खाने देंगे ?
सही के साथ खडे रहे हम,
ऐसी आप क्या शिक्षा देंगे ?

आज प्रगति चलन मे है ,
हर रोज कुछ नया बनता है ।
पर सीखा है हम सभी ने ,
जल्दी करने से बनता काम बिगडता है ।
जल्दी से फूल उगाओ ,
ऐेसा पौधो पर दबाव नही ।
प्रातःकाल से पूर्व सूरज आया ,
यह किसी को याद नही ।
फिर क्यो सामाजिक दौड मे,
बचपन पिस जाता है ?
उसे औहदे का लोभ नही
वह तो पतंग उडाना चाहता है ।
पर निराशा मिटाने को हम,
आरक्षण को दोष देते है ।
र्वण-व्यवस्था भी राजनैतिक थी ,
यह हम क्यो भुला देते है ।
दिखा सपना आसमान का ,
आप स्वयं ही हमारे सामने जला देंगे ।
पर फिर भी जिदंगी का हाथ न छोडू मै ,
ऐसी आप क्या शिक्षा देंगे ?

भिन्न होकर भी एक है हर मनुष्य ,
फिर अनेक समुदाय किसकी रक्षा कर रहे है ।
“जो मुझसा नही दिखता वह हीन ही होगा “,
हम यह किस सोच से चल रहे है ।
उपनाम मेरी पहचान है ,
यह बात किसने समझाई ?
दाड़ी बडी या मूँछ
यह बात कहां से आई ?
इसी धर्म मे गौरव है,
मैने कब इसपर चिन्तन किया।
किस घर मे मै जन्म लूँ
इसका मैने कब चयन किया।
“ढुढूंगा पहचान मेरी ,
यह पहचान तो मुझ पर थोपी है ।”
पर यह विचार तुम्हे नही सताएगा ,
इसकी रक्षा की जिम्मेदारी तुम्हे जो सौपी है ।
रंग कृष्ण नही तो दाग ,
लिंग शिव नही तो पाप है ।
घुटता हूँ मै हर समय ,
पहचान मेरी अभिशाप है ।
किताबो मे तो कही लिखा नही ,
तो आप अनजान अनाथ को क्या नाम देंगे ?
पर यह भी अनदेखा कर मै वद्रोह न करुँ
ऐसी आप क्या शिक्षा देंगे ?

वर्तमान न तो पीडित है ,
न इतिहास कोई दोषी है ।
समय और समझ दोनो अलग है,
सिर्फ प्रयासो से समस्या हल होती है ।
सोच का न होता देश कोई ,
यह तो समाज का र्दपण है ।
न पूरा अधिकार है मेरा मुझपर ,
न जीवन का अर्थ सर्मपण है ।
मै जीवन चक्र मे हूँ या जीवन चक्र मेरे अन्दर ,
किसकी कल्पना आप बहतर कर लेंगे ?
हम अब राजा नही नायक बनने की सोचे,
आप ऐसी क्या शिक्षा देंगे ?

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दादी, नानी और कहानी

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स्मृतियाँ भी, श्रुतियाँ भी,
दादी नानी की कहानियां भी,
मनोरंजन का साधन थी,
सीख कुछ सिखाती थी।
पाठ्यक्रम का हिस्सा थी,
मैडम भी पढ़ाती थी।
बोल देवो की वाणी है,
सपनो में आती है।
पुरखों ने ढोही है,
लकीरें बनाती है।
शक्ति है, अदृश्य है,
न ये बातें बचकानी है।
भीतर भी, बाहर भी,
जो भी सब घटता है,
मानो ना मानो,
वही सारी कहानी है।

कहानी भी सत्य है,
सारे सच्चे है पात्र।
सियासी इस जंगल में,
दल दल के पास,
खड़ा शेर तेजस्वी,
मिचकती ये आँख।
आडम्बर खड़ा हो गया?
अब ले लो बैठ सांस।
नायक के भेस में शासक,
ये कैसा विरोधाभास?
माया तो बस,
मन का भ्रम है।
गीदड़ पर चढ़ा,
सोने का पानी है।
भीतर भी, बाहर भी,
जो भी सब घटता है,
मानो ना मानो,
वही सारी कहानी है।

शक्लें भी बदलती है,
आधुनिकता भी फलती है।
पर रोटी इस शासन की,
मेरे चुहलें पर ही पकती है।
उनके रेशम के कीड़े क्यों मुझ पर,
ये धोती तो सूती है?
महा यज्ञ ये सत्ता का,
इसमें मेरी ही आहुति है।
एकड़ों का बंजर,
आंकड़े बस बनकर,
आश्वासन ही ला पाए,
अभागे के घर पर।
रिंकी के पापा,
सोये तो बिस्तर पर,
पर अगले दिन पेड़ पर,
उनकी देह गरदन के बल लटकी है।
जिज्ञासु सब पूछे,
कौन जात के थे?
आंकड़े का अंक ही तो था,
फर्क पड़ना बेमानी है।
भीतर भी, बाहर भी,
जो भी सब घटता है,
मानो ना मानो,
वही सारी कहानी है।

शीर्षक क्या था?
किसकी थी लिखाई?
कौनसी थी लीपी?
संदर्भ तो बता दो भाई।
पटल पर लिखी थी,
किसी कुटिया में मिली थी,
हुई थी अकाशवानी,
और धरती पर गिरी थी।
हम सबने देखा,
तो लकीरें खिंची थी,
एक भले मानुष ने समझा,
और जीवन दर्शन भ्रान्ति कही थी।
है बंदा वह खुदा का,
सारी भीड़ ने ये माना,
कोई मिथक विद्या नहीं ये,
ये इतिहास सबने ना जाना।
एक बार की बात है,
मेरी दादी ने कही थी,
संदेह शुभ नहीं होता,
नानी ने भी हाँ भरी थी।
और यूँ ही चल आ रही पारी पाटी,
सहज ज्ञान की मनमानी है।
भीतर भी, बहार भी,
जो भी सब घटता है,
मानो ना मानो,
सारी ही कहानी है।

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